वैमनस्य को दूर भगा दो,
जीवन में यह सर्वोपरि है,
लोभ मोह आकंठित प्राणी,
के उबार की संजीवनी है,
तेरे बेटा-बेटी जैसा,
यह सारा संसार है,
कर्म छोड़ जब लोभ में डूबा,
तभी तो अत्याचार है ,
अत्याचारी बनकर जिसने
कर्म किया भरपूर है,
उस प्राणी का इस धरती पर,
जीवन बोझिल- शूल है,
कोई लाभ नहीं जीवन भर,
छीन के रोटी खाने में,
कर्म करो सब मानवता के,
इस संसार घराने में.
(१९/१०/१०,९:१० पूर्वाह्न)
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